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Jitiya Vrat Katha In Hindi (जितिया व्रत कथा)

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Jitiya Vrat Katha In Hindi (जितिया व्रत कथा)

जिवितपुत्रिका व्रत या जितिया व्रत के शुभ अवसर पर, हिंदू माताएं अपने बच्चों के कल्याण के लिए व्रत रखती हैं। यह अनुष्ठान एक माँ के अपने बच्चों के प्रति असीम प्रेम और स्नेह का प्रतीक है।

जिवितपुत्रिका व्रत एक निर्जल व्रत है और माताओं को अपने बच्चों के लंबे और सुखी जीवन के लिए यह व्रत करना चाहिए।जिवितपुत्रिका व्रत के शुभ अवसर पर, हिंदू माताएं अपने बच्चों के कल्याण के लिए व्रत रखती हैं।

यह अनुष्ठान एक माँ के अपने बच्चों के प्रति असीम प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। जिवितपुत्रिका व्रत एक निर्जल व्रत है और माताओं को अपने बच्चों के लंबे और सुखी जीवन के लिए यह व्रत करना चाहिए।

इस लेख में हम जितिया व्रत और Jitiya Vrat Katha (जितिया व्रत कथा) के बारे में जानेंगे।

When to do Jitiya Vrat and Jitiya Vrat Katha (जितिया व्रत और जितिया व्रत कथा कब करनी चाहिए)?

हिन्दू पंचांग के अनुसार जिवितपुत्रिका (जितिया) व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस व्रत को जिउतिया, जितिया, जिवितपुत्रिका, जिमुतवाहन व्रत भी कहा जाता है।

Jitiya Vrat Katha Vidhi In Hindi (जितिया व्रत कथा विधि)

यह व्रत तीन दिनों तक चलता है। माताएं संतान प्राप्ति के लिए और अपने बच्चों के स्वस्थ जीवन और लंबी उम्र के लिए जीवितपुत्रिका का व्रत रखती हैं। हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से नवमी तिथि तक जितिया व्रत शुरू होता है।

हर साल जीतिया व्रत “नहाय खाए” से शुरू होता है। अष्टमी तिथि यानी पहले दिन स्नान करना चाहिए और दूसरे दिन निर्जला व्रत रखना चाहिए और तीसरे और अंतिम दिन व्रत तोड़ा जाता है.

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Benefits of Jitiya Vrat and Jitiya Vrat Katha (जितिया व्रत और जितिया व्रत कथा के लाभ)

जितिया व्रत और Jitiya Vrat Katha (जितिया व्रत कथा) का पालन करने से भक्तों के बच्चों को निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

  • भक्त के बच्चों को सुख और सुरक्षा का आशीर्वाद मिलेगा।
  • जिवितपुत्रिका व्रत करने वाले के बच्चों को समृद्धि और दीर्घायु प्रदान करता है।
  • जिवितपुत्रिका व्रत बच्चों के जीवन में सौभाग्य लाता है।
  • संतान को स्वास्थ्य और धन की प्राप्ति होगी।

Jitiya Vrat Katha In Hindi (जितिया व्रत कथा) 1

जितिया व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी है। धार्मिक कथाओं के अनुसार महाभारत के युद्ध में अपने पिता की मौत का बदला लेने की भावना से अश्वत्थामा पांडवों के शिविर में घुस गया।

शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे। अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार दिया, परंतु वे द्रोपदी की पांच संतानें थीं। फिर अुर्जन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि ले ली।

अश्वत्थामा ने फिर से बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चें को मारने का प्रयास किया और उसने ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ को नष्ट कर दिया।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरने के बाद जीवित होने के कारण उस बच्चे का नाम जीवित्पुत्रिका रखा गया। तब उस समय से ही संतान की लंबी उम्र के लिए जितिया का व्रत रखा जाने लगा।

Jitiya Vrat Katha In Hindi (जितिया व्रत कथा) 2

बहुत समय पहले की बात है कि गंधर्वों के एक राजकुमार हुआ करते थे जिनका नाम था जीमूतवाहन। बहुत ही पवित्र आत्मा, दयालु व हमेशा परोपकार में लगे रहने वाले जीमूतवाहन को राज पाट से बिल्कुल भी लगाव न था।

लेकिन पिता कब तक संभालते। वानप्रस्थ लेने के पश्चात वे सबकुछ जीमूतवाहन को सौंपकर चलने लगे। लेकिन जीमूतवाहन ने तुरंत अपनी तमाम जिम्मेदारियां अपने भाइयों को सौंपते हुए स्वयं वन में रहकर पिता की सेवा करने का मन बना लिया।

अब एक दिन वन में भ्रमण करते-करते जीमूतवाहन काफी दूर निकल आया। उसने देखा कि एक वृद्धा काफी विलाप कर रही है। जीमूतवाहन से कहा दूसरों का दुख देखा जाता था उसने सारी बात पता लगाई तो पता चला कि वह एक नागवंशी स्त्री है और पक्षीराज गरुड़ को बलि देने के लिये आज उसके इकलौते पुत्र की बारी है।

जीमूतवाहन ने उसे धीरज बंधाया और कहा कि उसके पुत्र की जगह पर वह स्वयं पक्षीराज का भोजन बनेगा। अब जिस वस्त्र में उस स्त्री का बालक लिपटा था उसमें जीमूतवाहन लिपट गया। जैसे ही समय हुआ पक्षीराज गरुड़ उसे ले उड़ा।

जब उड़ते उड़ते काफी दूर आ चुके तो पक्षीराज को हैरानी हुई कि आज मेरा यह भोजन चीख चिल्ला क्यों नहीं रहा है इसे जरा भी मृत्यु का भय नहीं है। अपने ठिकाने पर पंहुचने के पश्चात उसने जीमूतवाहन का परिचय लिया।

जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया। पक्षीराज जीमूतवाहन की दयालुता व साहस से प्रसन्न हुए व उसे जीवन दान देते हुए भविष्य में भी बलि न लेने का वचन दिया। मान्‍यता है क‍ि तभी से ही संतान की लंबी उम्र और कल्‍याण के ये व्रत रखा जाता है।

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Original link: One Hindu Dharma

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